Constitutional Background of Indian Constitution

संवैधानिक ढांचा (Constitutional Framework) का अर्थ है किसी देश की शासन व्यवस्था को चलाने वाले मूल नियम, सिद्धांत और संस्थाएँ। भारत में यह ढांचा भारतीय संविधान पर आधारित है।

Table of Contents

भारतीय संवैधानिक ढांचे की मुख्य विशेषताएँ:

  1. संविधान की सर्वोच्चता – संविधान देश का सर्वोच्च कानून है।
  2. संघीय व्यवस्था – केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन।
  3. संसदीय शासन प्रणाली – सरकार संसद के प्रति उत्तरदायी होती है।
  4. मौलिक अधिकार – नागरिकों को स्वतंत्रता और समानता के अधिकार।
  5. स्वतंत्र न्यायपालिका – न्यायपालिका संविधान की रक्षा करती है।
  6. धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक राज्य – सभी धर्मों को समान सम्मान।

 

भारतीय संवैधानिक ढांचे की ऐतिहसिक पृष्ठभूमि क्या है

 

भारतीय संवैधानिक ढांचे की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि ब्रिटिश शासन के दौरान बनाए गए विभिन्न अधिनियमों और सुधारों से जुड़ी हुई है। भारतीय संविधान का विकास धीरे-धीरे कई कानूनों और राजनीतिक घटनाओं के माध्यम से हुआ।

प्रमुख चरण:

  1. रेग्युलेटिंग एक्ट, 1773 – भारत में ब्रिटिश शासन को नियंत्रित करने का पहला प्रयास।
  2. पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 – ब्रिटिश सरकार का नियंत्रण बढ़ा।
  3. चार्टर एक्ट (1813, 1833, 1853) – प्रशासनिक सुधार किए गए।
  4. भारत सरकार अधिनियम, 1858 – ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त हुआ।
  5. भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 – सीमित राजनीतिक प्रतिनिधित्व दिया गया।
  6. भारत सरकार अधिनियम, 1935 – संघीय व्यवस्था और प्रांतीय स्वायत्तता की नींव रखी गई। 
  7. संविधान सभा (1946) – संविधान निर्माण के लिए गठित की गई।

भारत का संविधान 26 नवंबर 1949 को अपनाया गया और 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ।

कंपनी का शासन (1773 से 1857 तक)

रेग्युलेटिंग एक्ट, 1773

रेग्युलेटिंग एक्ट, 1773 ब्रिटिश संसद द्वारा पारित पहला महत्वपूर्ण कानून था, जिसका उद्देश्य भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासन को नियंत्रित करना था।

Regulating Act 1773

प्रमुख कारण:

  1. ईस्ट इंडिया कंपनी में भ्रष्टाचार बढ़ना
  2. कंपनी की आर्थिक स्थिति खराब होना
  3. ब्रिटिश सरकार का नियंत्रण स्थापित करना

मुख्य प्रावधान:

  1. बंगाल के गवर्नर को “गवर्नर जनरल ऑफ बंगाल” बनाया गया। सहयता के लिये चार सदस्यीय परिषद् का गठन किया गया.
  2. वारेन हेस्टिंग्स पहले गवर्नर जनरल बने।
  3. मद्रास और बॉम्बे प्रेसिडेंसी को बंगाल के अधीन किया गया।
  4. कलकत्ता में सुप्रीम कोर्ट की स्थापना (1774)। जिसमें मुख्य न्यायाधीश और तीन अन्य न्यायाधीश थे।
  5. कंपनी के अधिकारियों पर नियंत्रण लगाया गया।

महत्व:

  • भारत में केंद्रीकृत प्रशासन की शुरुआत
  • ब्रिटिश संसद का पहला हस्तक्षेप
  • भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था की नींव

1781 का संशोधन अधिनियम (Act of Settlement, 1781)

1781 का संशोधन अधिनियम ब्रिटिश संसद द्वारा पारित किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य रेग्युलेटिंग एक्ट, 1773 की कमियों को दूर करना था।

Act of Settlement 1781

मुख्य प्रावधान:

  1. सुप्रीम कोर्ट की शक्तियाँ सीमित की गईं।
  2. भारतीयों के व्यक्तिगत कानूनों और परंपराओं को मान्यता दी गई।
  3. गवर्नर जनरल और उसकी परिषद के सरकारी कार्यों को सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र से बाहर रखा गया।
  4. राजस्व मामलों को सुप्रीम कोर्ट के नियंत्रण से अलग किया गया।

महत्व:

  • न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच विवाद कम हुआ।
  • भारतीय रीति-रिवाजों की रक्षा हुई।
  • प्रशासनिक व्यवस्था अधिक स्पष्ट और प्रभावी बनी।

पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 (Pitt’s India Act, 1784)

यह अधिनियम ब्रिटिश प्रधानमंत्री विलियम पिट द्वारा लाया गया था। इसका उद्देश्य ईस्ट इंडिया कंपनी पर ब्रिटिश सरकार का नियंत्रण बढ़ाना था। 

Pits India Act 1784

मुख्य प्रावधान:

  1. Board of Control की स्थापना की गई।
  2. ब्रिटिश सरकार को कंपनी के नागरिक, सैन्य और राजस्व मामलों पर नियंत्रण मिला।
  3. कंपनी के व्यापारिक और राजनीतिक कार्यों को अलग किया गया।
  4. भारत में प्रशासनिक केंद्रीकरण को बढ़ावा मिला।

महत्व:

  • भारत पर ब्रिटिश सरकार का प्रत्यक्ष नियंत्रण बढ़ा।
  • कंपनी अब केवल व्यापारिक संस्था नहीं रही।
  • गवर्नर जनरल की शक्ति मजबूत हुई। इसे “Dual System of Control” की शुरुआत माना जाता है।

1786 का संशोधन अधिनियम (Amendment Act, 1786)

1786 का संशोधन अधिनियम ब्रिटिश संसद द्वारा पारित किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य गवर्नर जनरल की शक्तियों को बढ़ाना और भारत में प्रशासन को अधिक प्रभावी बनाना था।

1786 ka adhiniyam

मुख्य प्रावधान:

  1. गवर्नर जनरल को विशेष परिस्थितियों में अपनी परिषद के निर्णय को अस्वीकार करने का अधिकार मिला।
  2. गवर्नर जनरल को Commander-in-Chief का पद भी दिया जा सकता था।
  3. लॉर्ड कॉर्नवालिस को अधिक शक्तियाँ प्रदान की गईं।

महत्व:

  • भारत में प्रशासनिक केंद्रीकरण मजबूत हुआ।
  • गवर्नर जनरल का पद अधिक शक्तिशाली बना।
  • ब्रिटिश सरकार का नियंत्रण और प्रभाव बढ़ा।

✅ यह अधिनियम लॉर्ड कॉर्नवालिस की मांगों को ध्यान में रखकर बनाया गया था।

चार्टर एक्ट, 1793 (Charter Act of 1793)

चार्टर एक्ट 1793 ब्रिटिश संसद द्वारा पारित किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन और व्यापारिक अधिकारों को अगले 20 वर्षों के लिए बढ़ाना था।

Charter Act of 1793

मुख्य प्रावधान:

  1. ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक अधिकारों को 20 वर्षों के लिए नवीनीकृत किया गया।
  2. गवर्नर जनरल की शक्तियों को और मजबूत किया गया।
  3. मद्रास और बॉम्बे प्रेसिडेंसी को बंगाल के अधीन रखा गया।
  4. कंपनी के कर्मचारियों के वेतन और खर्च भारतीय राजस्व से देने की व्यवस्था की गई।
  5. Commander-in-Chief को गवर्नर जनरल की परिषद का सदस्य बनाया जा सकता था।

महत्व:

  • ब्रिटिश नियंत्रण और अधिक मजबूत हुआ।
  • प्रशासनिक केंद्रीकरण को बढ़ावा मिला।
  • गवर्नर जनरल की स्थिति शक्तिशाली बनी।

✅ कंपनी का व्यापारिक एकाधिकार जारी रहा।

चार्टर एक्ट, 1813 (Charter Act of 1813)

चार्टर एक्ट 1813 ब्रिटिश संसद द्वारा पारित एक महत्वपूर्ण अधिनियम था। इसका उद्देश्य ईस्ट इंडिया कंपनी के चार्टर को अगले 20 वर्षों के लिए बढ़ाना और भारत में ब्रिटिश नियंत्रण को मजबूत करना था।

Charter Act of 1813

मुख्य प्रावधान:

  1. ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत के साथ व्यापारिक एकाधिकार समाप्त किया गया, लेकिन चीन व्यापार और चाय व्यापार पर अधिकार बना रहा।
  2. ईसाई मिशनरियों को भारत में प्रचार की अनुमति मिली।
  3. भारतीय शिक्षा के लिए प्रतिवर्ष 1 लाख रुपये देने का प्रावधान किया गया।
  4. ब्रिटिश सरकार का कंपनी पर नियंत्रण और बढ़ा।

महत्व:

  • भारत में अंग्रेजी शिक्षा की शुरुआत का आधार बना।
  • व्यापार में स्वतंत्रता बढ़ी।
  • भारत पर ब्रिटिश शासन अधिक मजबूत हुआ।

✅ कंपनी का व्यापारिक एकाधिकार पहली बार टूटा।

चार्टर एक्ट, 1833 (Charter Act of 1833)

चार्टर एक्ट 1833 ब्रिटिश संसद द्वारा पारित एक महत्वपूर्ण अधिनियम था। इसे Government of India Act 1833 या Saint Helena Act भी कहा जाता है। इसका उद्देश्य भारत में ब्रिटिश प्रशासन को केंद्रीकृत करना था।

Charter Act of 1833

मुख्य प्रावधान:

  1. बंगाल के गवर्नर जनरल को भारत का गवर्नर जनरल बनाया गया।
  2. लॉर्ड विलियम बेंटिंक पहले गवर्नर जनरल बने। 
  3. ईस्ट इंडिया कंपनी का व्यापारिक कार्य पूरी तरह समाप्त कर दिया गया।
  4. भारत में कानून निर्माण का अधिकार केंद्रीकृत किया गया।
  5. भारतीयों को योग्यता के आधार पर सरकारी नौकरी का अवसर देने की बात कही गई।

महत्व:

  • भारत में केंद्रीकृत शासन की शुरुआत हुई।
  • कंपनी अब केवल प्रशासनिक संस्था बन गई।
  • आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्था की नींव पड़ी।

Important Point:

✅ पहला “Governor-General of India” बनाया गया।
✅ कंपनी का व्यापारिक एकाधिकार समाप्त हुआ।

चार्टर एक्ट, 1853 (Charter Act of 1853)

चार्टर एक्ट 1853 ब्रिटिश संसद द्वारा पारित ईस्ट इंडिया कंपनी से संबंधित अंतिम चार्टर अधिनियम था। इसका उद्देश्य भारत के प्रशासन में सुधार करना था।

Charter Act of 1853

मुख्य प्रावधान:

  1. गवर्नर जनरल की परिषद के विधायी और कार्यकारी कार्यों को अलग किया गया।
  2. विधायी परिषद में नए सदस्यों को शामिल किया गया।
  3. भारतीय सिविल सेवा (ICS) में खुली प्रतियोगी परीक्षा की व्यवस्था शुरू हुई। 
  4. कंपनी के शासन को जारी रखा गया, लेकिन अवधि निर्धारित नहीं की गई।
  5. प्रशासनिक सुधारों की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया गया। 

महत्व:

  • आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्था की नींव मजबूत हुई।
  • प्रतियोगी परीक्षा प्रणाली की शुरुआत हुई।
  • 1858 के भारत शासन अधिनियम का मार्ग प्रशस्त हुआ।

Important Point:

✅ ईस्ट इंडिया कंपनी से संबंधित अंतिम चार्टर एक्ट।
✅ ICS परीक्षा की शुरुआत इसी अधिनियम से हुई।

ताज का शासन (1858 से 1947 तक)

भारत सरकार अधिनियम, 1858 (Government of India Act, 1858)

भारत सरकार अधिनियम 1858 ब्रिटिश संसद द्वारा पारित किया गया था। यह अधिनियम 1857 के विद्रोह के बाद लाया गया, ताकि भारत का शासन ईस्ट इंडिया कंपनी से लेकर सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन किया जा सके। 

Government of India Act, 1858

मुख्य प्रावधान:

  1. ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त कर दिया गया।
  2. भारत का शासन सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन आ गया।
  3. भारत सचिव (Secretary of State for India) का पद बनाया गया।
  4. गवर्नर जनरल को “वायसराय” कहा जाने लगा।
  5. लॉर्ड कैनिंग भारत के पहले वायसराय बने। 

महत्व:

  • भारत में ब्रिटिश क्राउन शासन की शुरुआत हुई।
  • प्रशासन अधिक केंद्रीकृत और नियंत्रित हुआ।
  • आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूती मिली।

Important Point:

✅ ईस्ट इंडिया कंपनी का अंत।
✅ भारत में क्राउन शासन की शुरुआत।

भारत सरकार अधिनियम 1858 (Government of India Act 1858) ब्रिटिश संसद द्वारा पारित एक महत्वपूर्ण कानून था। इसे 1857 के विद्रोह (First War of Independence) के बाद लागू किया गया। इस अधिनियम से भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त हो गया और शासन सीधे ब्रिटिश क्राउन (रानी विक्टोरिया) के अधीन आ गया।

1858 के भारत सरकार अधिनियम के मुख्य प्रावधान

  1. ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त
    • कंपनी से भारत का पूरा प्रशासन ब्रिटिश सरकार ने अपने हाथ में ले लिया।
  2. भारत सचिव (Secretary of State for India) का पद बनाया गया
    • ब्रिटिश सरकार ने भारत के प्रशासन के लिए एक भारत सचिव नियुक्त किया।
    • उसकी सहायता के लिए 15 सदस्यों की एक परिषद बनाई गई।
  3. गवर्नर जनरल को वायसराय कहा जाने लगा
    • भारत के गवर्नर जनरल को अब “वायसराय” कहा गया।
    • लॉर्ड कैनिंग भारत के पहले वायसराय बने।
  4. द्वैध शासन (Dual Government) समाप्त
    • पहले कंपनी और ब्रिटिश सरकार दोनों का नियंत्रण था, जिसे समाप्त कर दिया गया।
  5. भारतीय रियासतों को आश्वासन
    • ब्रिटिश सरकार ने भारतीय राजाओं को उनके राज्यों की सुरक्षा का भरोसा दिया ताकि वे अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह न करें।

इस अधिनियम का महत्व

  • भारत में कंपनी शासन का अंत हुआ।
  • भारत सीधे ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा बन गया।
  • ब्रिटिश सरकार ने भारतीय प्रशासन पर अधिक नियंत्रण स्थापित किया।
  • इसे भारत में ब्रिटिश क्राउन शासन की शुरुआत माना जाता है।

1861 के भारत सरकार अधिनियम 

Government of India Act 1861

1. विधायी परिषद का पुनर्गठन

  • गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी परिषद में कानून बनाने के लिए अतिरिक्त सदस्यों को जोड़ा गया।
  • इसमें 6 से 12 अतिरिक्त सदस्य नियुक्त किए जा सकते थे।
  • पहली बार भारतीयों को भी परिषद में शामिल करने की अनुमति दी गई।

2. भारतीयों को परिषद में स्थान

  • अंग्रेजों ने कुछ भारतीय राजाओं और जमींदारों को परिषद में नामित किया।
  • लॉर्ड कैनिंग ने 1862 में तीन भारतीयों को परिषद में शामिल किया:
    • महाराजा पटियाला
    • राजा बनारस
    • सर दिनकर राव

➡️ यह पहली बार था जब भारतीयों को कानून निर्माण में भाग लेने का अवसर मिला।

3. प्रांतों को विधायी शक्तियाँ

  • बंबई और मद्रास को पुनः कानून बनाने की शक्ति दी गई।
  • बाद में अन्य प्रांतों को भी सीमित विधायी अधिकार मिले।
  • इससे प्रशासन का विकेंद्रीकरण शुरू हुआ।

4. विभागीय प्रणाली (Portfolio System)

  • लॉर्ड कैनिंग ने विभागीय व्यवस्था शुरू की।
  • प्रत्येक सदस्य को अलग विभाग दिया गया जैसे:
    • वित्त
    • सेना
    • कानून
    • गृह विभाग

➡️ इससे प्रशासन अधिक व्यवस्थित हुआ।


5. अध्यादेश जारी करने की शक्ति

  • गवर्नर जनरल को आपातकाल में अध्यादेश (Ordinance) जारी करने का अधिकार मिला।
  • यह अध्यादेश 6 महीने तक लागू रह सकता था।

6. नए प्रांत बनाने का अधिकार

  • गवर्नर जनरल को नए प्रांत बनाने तथा उनकी सीमाएँ बदलने का अधिकार मिला।

अधिनियम का महत्व

  • भारतीयों को पहली बार शासन में सीमित भागीदारी मिली।
  • भारत में विकेंद्रीकरण की शुरुआत हुई।
  • आधुनिक विधायी प्रणाली की नींव पड़ी।
  • अंग्रेजों ने भारतीयों का सहयोग प्राप्त करने का प्रयास किया।

1861 अधिनियम की कमियाँ

  • भारतीय सदस्यों की संख्या बहुत कम थी।
  • भारतीय केवल सलाह दे सकते थे, निर्णय नहीं ले सकते थे।
  • वास्तविक शक्ति अंग्रेजों के हाथ में ही रही।
  • लोकतांत्रिक अधिकार नहीं दिए गए।

परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

विषय तथ्य
अधिनियम का नाम Indian Councils Act, 1861
लागू किया गया 1861
वायसराय लॉर्ड कैनिंग
मुख्य उद्देश्य प्रशासनिक सुधार और भारतीयों की सीमित भागीदारी
पहली बार भारतीय शामिल 1862
विशेषता पोर्टफोलियो प्रणाली की शुरुआत

एक लाइन में

“1861 का भारत सरकार अधिनियम भारतीयों को शासन में सीमित भागीदारी देने और प्रशासन के विकेंद्रीकरण की दिशा में पहला कदम था।

1892 का भारत सरकार अधिनियम

(Indian Councils Act, 1892)

1892 का भारत सरकार अधिनियम ब्रिटिश सरकार द्वारा पारित एक महत्वपूर्ण कानून था। इसका उद्देश्य भारतीयों को प्रशासन और कानून निर्माण की प्रक्रिया में थोड़ी अधिक भागीदारी देना था। यह अधिनियम भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की मांगों तथा बढ़ते राष्ट्रीय आंदोलन के दबाव के कारण लाया गया।

Indian Councils Act, 1892

पृष्ठभूमि (Background)

  • 1885 में Indian National Congress की स्थापना हुई।
  • कांग्रेस ने प्रशासन में भारतीयों की भागीदारी बढ़ाने की मांग की।
  • भारतीय शिक्षित वर्ग ब्रिटिश नीतियों से असंतुष्ट था।
  • इसलिए ब्रिटिश सरकार ने 1892 का अधिनियम पारित किया।

1892 के भारत सरकार अधिनियम के मुख्य बिंदु

1. विधायी परिषदों का विस्तार

  • केंद्रीय और प्रांतीय विधान परिषदों के सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई।
  • इससे परिषदों का आकार बड़ा हुआ।

केंद्रीय परिषद

  • अतिरिक्त सदस्यों की संख्या बढ़ाकर 10 से 16 कर दी गई।

प्रांतीय परिषद

  • बंबई, मद्रास, बंगाल आदि प्रांतों में भी सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई।

2. अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली की शुरुआत

  • पहली बार चुनाव जैसी प्रक्रिया शुरू की गई।
  • हालांकि “चुनाव” शब्द का प्रयोग नहीं किया गया।
  • विभिन्न संस्थाएँ जैसे:
  • नगरपालिकाएँ
  • जिला बोर्ड
  • विश्वविद्यालय
  • व्यापार मंडल

अपने प्रतिनिधियों की सिफारिश करती थीं।

➡️ अंतिम नियुक्ति गवर्नर जनरल करता था।

3. बजट पर चर्चा का अधिकार

  • परिषद के सदस्यों को पहली बार बजट पर चर्चा करने का अधिकार मिला।
  • वे सरकार से प्रश्न पूछ सकते थे।

लेकिन:

  • पूरक प्रश्न पूछने की अनुमति नहीं थी।
  • मतदान का अधिकार नहीं था।

4. प्रश्न पूछने का अधिकार

  • सदस्य सार्वजनिक मामलों पर प्रश्न पूछ सकते थे।
  • प्रश्न पूछने से पहले 6 दिन का नोटिस देना पड़ता था।

5. भारतीय प्रतिनिधित्व में वृद्धि

  • परिषदों में भारतीय सदस्यों की संख्या पहले से अधिक हुई।
  • शिक्षित भारतीयों को प्रशासन में सीमित भागीदारी मिली।

अधिनियम का महत्व

1. चुनाव प्रणाली की शुरुआत

  • भारत में प्रतिनिधित्व आधारित शासन की शुरुआत हुई।

2. भारतीयों की भागीदारी बढ़ी

  • भारतीयों को प्रशासन में सीमित भूमिका मिली।

3. राष्ट्रीय आंदोलन को बल

  • भारतीय नेताओं को राजनीतिक अनुभव प्राप्त हुआ।

4. लोकतांत्रिक प्रक्रिया की नींव

  • आगे के संवैधानिक सुधारों का मार्ग प्रशस्त हुआ।

अधिनियम की कमियाँ

  • वास्तविक शक्ति ब्रिटिश सरकार के पास रही।
  • चुनाव प्रत्यक्ष नहीं थे।
  • परिषदों के अधिकार बहुत सीमित थे।
  • बजट पर मतदान की अनुमति नहीं थी।
  • भारतीयों की मांगें पूरी नहीं हुईं।

परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

विषय तथ्य
अधिनियम का नाम Indian Councils Act, 1892
लागू वर्ष 1892
मुख्य उद्देश्य भारतीयों की सीमित भागीदारी बढ़ाना
विशेषता अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली की शुरुआत
नया अधिकार बजट पर चर्चा और प्रश्न पूछना
प्रेरणा कांग्रेस की मांगें

एक लाइन में

“1892 का भारत सरकार अधिनियम भारत में अप्रत्यक्ष चुनाव और सीमित लोकतांत्रिक भागीदारी की शुरुआत करने वाला अधिनियम था।”

भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 (Indian Councils Act, 1892)

भारतीय परिषद अधिनियम 1892 ब्रिटिश संसद द्वारा पारित एक महत्वपूर्ण अधिनियम था। इसका उद्देश्य भारत में विधायी परिषदों का विस्तार करना और भारतीयों की सीमित भागीदारी बढ़ाना था। 

मुख्य प्रावधान:

  1. केंद्रीय और प्रांतीय विधान परिषदों के सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई। 
  2. पहली बार अप्रत्यक्ष चुनाव (Indirect Election) की व्यवस्था शुरू हुई।
  3. परिषदों को बजट पर चर्चा करने का अधिकार मिला।
  4. सदस्य सरकार से प्रश्न पूछ सकते थे, लेकिन पूरक प्रश्न नहीं पूछ सकते थे। 

महत्व:

  • भारतीयों की प्रशासन में भागीदारी बढ़ी।
  • प्रतिनिधित्वात्मक शासन की शुरुआत हुई।
  • भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की मांगों को आंशिक रूप से स्वीकार किया गया। 

Important Point:

✅ पहली बार चुनाव प्रणाली की शुरुआत।
✅ बजट पर चर्चा का अधिकार मिला।

1909 का भारत परिषद अधिनियम

इसे मार्ले-मिंटो सुधार (Morley-Minto Reforms) भी कहा जाता है।

  • लॉर्ड मिंटो उस समय भारत के वायसराय थे।
  • लॉर्ड मार्ले ब्रिटेन के भारत सचिव थे।
  • इस अधिनियम का उद्देश्य भारतीयों को शासन में कुछ अधिक भागीदारी देना और बढ़ते राष्ट्रीय आंदोलन को शांत करना था।
Morley-Minto Reforms 1909

पृष्ठभूमि (Background)

  • 1885 में Indian National Congress की स्थापना के बाद राष्ट्रीय आंदोलन तेज होने लगा।
  • बंगाल विभाजन (1905) के कारण पूरे देश में विरोध बढ़ गया।
  • कांग्रेस स्वशासन (Self Government) की मांग कर रही थी।
  • मुस्लिम नेताओं ने अलग राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग की।
  • इन परिस्थितियों में ब्रिटिश सरकार ने 1909 का अधिनियम पारित किया।

1909 के भारत परिषद अधिनियम के मुख्य बिंदु

1. विधायी परिषदों का विस्तार
  • केंद्रीय और प्रांतीय विधान परिषदों के सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई।

केंद्रीय विधान परिषद

  • सदस्यों की संख्या 16 से बढ़ाकर लगभग 60 कर दी गई।

प्रांतीय परिषद

  • बंबई, मद्रास, बंगाल आदि में भी सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई।

➡️ इससे परिषदों में चर्चा का दायरा बढ़ा।


2. पृथक निर्वाचन प्रणाली (Separate Electorate)
  • मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचन व्यवस्था शुरू की गई।
  • मुस्लिम मतदाता केवल मुस्लिम उम्मीदवार को वोट दे सकते थे।

➡️ यह अधिनियम की सबसे महत्वपूर्ण और विवादास्पद विशेषता थी।

प्रभाव

  • भारतीय राजनीति में सांप्रदायिकता को बढ़ावा मिला।
  • आगे चलकर देश के विभाजन की पृष्ठभूमि बनी।
3. चुनाव प्रणाली का विस्तार
  • पहली बार कुछ सदस्यों का चुनाव सीधे/अप्रत्यक्ष रूप से होने लगा।
  • हालांकि पूर्ण लोकतांत्रिक चुनाव नहीं थे।

4. भारतीयों की कार्यकारिणी परिषद में नियुक्ति
  • पहली बार भारतीयों को वायसराय की कार्यकारिणी परिषद में स्थान मिला।

उदाहरण

  • Satyendra Prasanna Sinha पहले भारतीय बने जिन्हें वायसराय की कार्यकारिणी परिषद में शामिल किया गया।

5. परिषदों के अधिकार बढ़े
  • सदस्यों को:
    • प्रश्न पूछने का अधिकार मिला।
    • पूरक प्रश्न पूछने की अनुमति मिली।
    • बजट पर चर्चा का अधिकार मिला।
    • प्रस्ताव रखने की सीमित अनुमति मिली।
6. भारतीय प्रतिनिधित्व में वृद्धि
  • परिषदों में भारतीय सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई।
  • शिक्षित भारतीयों को प्रशासन में अधिक अवसर मिला।

अधिनियम का महत्व

1. राजनीतिक भागीदारी में वृद्धि
  • भारतीयों की प्रशासन में भागीदारी बढ़ी।
2. चुनाव प्रणाली का विकास
  • प्रतिनिधित्व आधारित शासन को बढ़ावा मिला।
3. भारतीयों को उच्च पद
  • पहली बार भारतीयों को उच्च प्रशासनिक पदों में जगह मिली।
4. संवैधानिक सुधारों की दिशा में कदम
  • आगे के सुधारों (1919, 1935) का मार्ग प्रशस्त हुआ।

अधिनियम की कमियाँ

1. पृथक निर्वाचन प्रणाली
  • हिंदू-मुस्लिम विभाजन बढ़ा।
2. सीमित अधिकार
  • वास्तविक शक्ति ब्रिटिश सरकार के पास ही रही।
3. लोकतंत्र का अभाव
  • मताधिकार बहुत सीमित था।
4. ब्रिटिश नियंत्रण कायम
  • गवर्नर जनरल किसी भी प्रस्ताव को अस्वीकार कर सकता था।

परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

विषय तथ्य
अधिनियम का नाम Indian Councils Act, 1909
दूसरा नाम Morley-Minto Reforms
वायसराय लॉर्ड मिंटो
भारत सचिव लॉर्ड मार्ले
सबसे महत्वपूर्ण विशेषता पृथक निर्वाचन प्रणाली
पहले भारतीय सदस्य सत्येंद्र प्रसन्न सिन्हा
मुख्य उद्देश्य भारतीयों की सीमित भागीदारी बढ़ाना

एक लाइन में

“1909 का भारत परिषद अधिनियम भारतीयों की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने तथा मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन प्रणाली शुरू करने वाला अधिनियम था।

1919 का भारत शासन अधिनियम

इसे मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार (Montagu–Chelmsford Reforms) भी कहा जाता है।

  • एडविन मॉन्टेग्यू (भारत सचिव) और लॉर्ड चेम्सफोर्ड (वायसराय) के सुझावों पर यह अधिनियम बनाया गया।
  • इसका उद्देश्य भारतीयों को प्रशासन में अधिक भागीदारी देना और धीरे-धीरे उत्तरदायी शासन (Responsible Government) की ओर बढ़ना था।
Montagu–Chelmsford Reforms 1919

पृष्ठभूमि (Background)

  • प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) में भारत ने ब्रिटेन की सहायता की।
  • भारतीय नेताओं को उम्मीद थी कि युद्ध के बाद उन्हें अधिक राजनीतिक अधिकार मिलेंगे।
  • 20 अगस्त 1917 को मॉन्टेग्यू घोषणा की गई, जिसमें भारत में क्रमिक रूप से स्वशासन देने का वादा किया गया।
  • इसी घोषणा के आधार पर 1919 का अधिनियम पारित किया गया।

1919 के भारत शासन अधिनियम की मुख्य विशेषताएँ

1. प्रांतों में द्वैध शासन (Diarchy) की स्थापना

यह इस अधिनियम की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता थी।

प्रांतीय विषयों को दो भागों में बाँटा गया:

(क) आरक्षित विषय (Reserved Subjects)

इन पर गवर्नर और उसकी कार्यकारिणी परिषद का नियंत्रण था।

उदाहरण:

  • पुलिस
  • न्याय
  • भूमि राजस्व
  • सिंचाई
  • वित्त

(ख) हस्तांतरित विषय (Transferred Subjects)

इनका संचालन भारतीय मंत्रियों द्वारा किया जाता था।

उदाहरण:

  • शिक्षा
  • स्वास्थ्य
  • कृषि
  • स्थानीय स्वशासन
  • उद्योग

➡️ भारतीय मंत्री विधान परिषद के प्रति उत्तरदायी थे।


2. केंद्र में द्विसदनीय विधानमंडल (Bicameral Legislature)

पहली बार केंद्र में दो सदनों वाली व्यवस्था शुरू हुई।

(क) राज्य परिषद (Council of State)
  • उच्च सदन
  • कुल सदस्य: 60
  • कार्यकाल: 5 वर्ष
(ख) विधान सभा (Legislative Assembly)
  • निम्न सदन
  • कुल सदस्य: 145
  • कार्यकाल: 3 वर्ष

3. मताधिकार (Franchise) का विस्तार
  • सीमित स्तर पर मतदान का अधिकार बढ़ाया गया।
  • लगभग 10% आबादी को वोट देने का अधिकार मिला।
  • मताधिकार संपत्ति, शिक्षा और कर भुगतान के आधार पर दिया गया।

➡️ सार्वभौमिक मताधिकार नहीं था।


4. भारतीयों की भागीदारी में वृद्धि
  • केंद्र और प्रांतों की विधान परिषदों में भारतीय सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई।
  • कुछ भारतीयों को प्रशासन में उच्च पद दिए गए।
5. पृथक निर्वाचन प्रणाली जारी
  • मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचन प्रणाली जारी रही।
  • बाद में सिखों, एंग्लो-इंडियनों और यूरोपियनों को भी पृथक निर्वाचन मिला।

➡️ इससे सांप्रदायिक राजनीति को बढ़ावा मिला।


6. भारत सचिव के नियंत्रण में कमी
  • भारत सचिव (Secretary of State) की शक्तियों में कुछ कमी की गई।
  • लेकिन अंतिम नियंत्रण ब्रिटिश सरकार के पास ही रहा।

7. लोक सेवा आयोग (Public Service Commission)
  • सरकारी नौकरियों में भर्ती के लिए लोक सेवा आयोग बनाने का प्रावधान किया गया।
  • बाद में 1926 में संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की स्थापना हुई।
8. बजट पर चर्चा का अधिकार
  • विधानमंडल को बजट पर चर्चा करने का अधिकार मिला।
  • सदस्य प्रश्न पूछ सकते थे और प्रस्ताव रख सकते थे।

1919 अधिनियम का महत्व

1. उत्तरदायी शासन की दिशा में पहला कदम

  • भारतीय मंत्रियों को कुछ प्रशासनिक जिम्मेदारियाँ मिलीं।

2. लोकतांत्रिक संस्थाओं का विकास

  • चुनाव और विधानमंडल की भूमिका बढ़ी।

3. भारतीय राजनीतिक जागरूकता में वृद्धि

  • भारतीय नेताओं को शासन का अनुभव मिला।

4. आगे के सुधारों का आधार

  • 1935 के भारत शासन अधिनियम की नींव बनी।

1919 अधिनियम की कमियाँ

1. द्वैध शासन असफल रहा

  • प्रशासन में भ्रम और टकराव पैदा हुआ।

2. वास्तविक शक्ति अंग्रेजों के पास रही

  • गवर्नर के पास विशेष अधिकार थे।

3. सीमित मताधिकार

  • अधिकांश जनता को वोट देने का अधिकार नहीं था।

4. सांप्रदायिकता को बढ़ावा

  • पृथक निर्वाचन प्रणाली जारी रही।

5. पूर्ण उत्तरदायी शासन नहीं

  • भारतीय मंत्रियों के पास सीमित शक्तियाँ थीं।

अधिनियम के परिणाम

  • भारतीय इस अधिनियम से संतुष्ट नहीं हुए।
  • 1919 में रॉलेट एक्ट लागू किया गया।
  • जलियांवाला बाग हत्याकांड हुआ।
  • महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन शुरू हुआ।

परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

विषय तथ्य
अधिनियम का नाम Government of India Act, 1919
दूसरा नाम Montagu–Chelmsford Reforms
मुख्य विशेषता प्रांतों में द्वैध शासन
वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड
भारत सचिव एडविन मॉन्टेग्यू
केंद्र में व्यवस्था द्विसदनीय विधानमंडल
मताधिकार सीमित
महत्वपूर्ण प्रभाव उत्तरदायी शासन की शुरुआत

एक लाइन में

“1919 का भारत शासन अधिनियम प्रांतों में द्वैध शासन लागू करने और भारतीयों की प्रशासनिक भागीदारी बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण संवैधानिक सुधार था।

1935 का भारत शासन अधिनियम

(Government of India Act, 1935)

1935 का भारत शासन अधिनियम ब्रिटिश संसद द्वारा पारित सबसे बड़ा और विस्तृत संवैधानिक अधिनियम था।
यह अधिनियम भारत के प्रशासन में बड़े बदलाव लाने के लिए बनाया गया था। इसी अधिनियम के कई प्रावधान बाद में भारतीय संविधान का आधार बने।

Government of India Act, 1935

पृष्ठभूमि (Background)

  • 1919 के अधिनियम की कमियों के कारण भारतीय असंतुष्ट थे।
  • साइमन कमीशन (1927) भारत आया, जिसका व्यापक विरोध हुआ।
  • गोलमेज सम्मेलन (Round Table Conferences) आयोजित किए गए।
  • 1933 में श्वेत पत्र (White Paper) प्रकाशित हुआ।
  • संयुक्त संसदीय समिति (Joint Select Committee) की सिफारिशों के आधार पर 1935 का अधिनियम पारित हुआ।

1935 के भारत शासन अधिनियम की मुख्य विशेषताएँ


1. अखिल भारतीय संघ (All India Federation)

  • भारत में एक संघीय व्यवस्था स्थापित करने का प्रस्ताव रखा गया।
  • इसमें शामिल होने थे:
    • ब्रिटिश भारतीय प्रांत
    • देशी रियासतें

➡️ लेकिन रियासतों ने शामिल होने से मना कर दिया, इसलिए संघीय व्यवस्था लागू नहीं हो सकी।


2. प्रांतीय स्वायत्तता (Provincial Autonomy)

यह अधिनियम की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता थी।

  • प्रांतों में द्वैध शासन (Diarchy) समाप्त कर दिया गया।
  • प्रांतों को स्वायत्तता दी गई।
  • मंत्रिपरिषद विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी बनी।

➡️ अब प्रांतों में चुनी हुई सरकारें काम करने लगीं।

3. केंद्र में द्वैध शासन (Diarchy at Centre)

  • केंद्र में द्वैध शासन लागू करने का प्रस्ताव था।

आरक्षित विषय:

  • रक्षा
  • विदेश मामले
  • जनजातीय क्षेत्र

हस्तांतरित विषय:

  • अन्य सामान्य प्रशासनिक विषय

➡️ लेकिन यह व्यवस्था पूरी तरह लागू नहीं हो सकी।


4. संघीय न्यायालय (Federal Court)

  • 1937 में भारत में संघीय न्यायालय की स्थापना की गई।
  • यह सर्वोच्च न्यायिक संस्था थी।

➡️ बाद में यही भारत के सुप्रीम कोर्ट का आधार बना।

5. तीन सूचियों (Three Lists) की व्यवस्था

विषयों को तीन भागों में बाँटा गया:

सूची विषय
संघ सूची रक्षा, विदेश नीति
प्रांतीय सूची पुलिस, स्वास्थ्य
समवर्ती सूची शिक्षा, विवाह

➡️ आज भारतीय संविधान में भी यही व्यवस्था है।


6. द्विसदनीय विधानमंडल (Bicameralism)

कुछ प्रांतों में दो सदनों वाली व्यवस्था शुरू की गई।

उदाहरण:

  • बंगाल
  • बिहार
  • बंबई
  • मद्रास
  • असम
  • संयुक्त प्रांत

7. मताधिकार का विस्तार

  • लगभग 10% से बढ़ाकर 14% आबादी को वोट देने का अधिकार मिला।
  • फिर भी सार्वभौमिक मताधिकार नहीं था।

8. पृथक निर्वाचन प्रणाली का विस्तार

  • मुसलमानों के अलावा:
  • सिख
  • ईसाई
  • एंग्लो-इंडियन
  • मजदूर
  • व्यापारी वर्ग

को भी पृथक निर्वाचन दिया गया।

➡️ इससे सांप्रदायिकता और बढ़ी।


9. रिज़र्व बैंक की स्थापना

  • Reserve Bank of India की स्थापना 1935 में इसी अधिनियम के तहत हुई।

10. लोक सेवा आयोग

  • संघीय लोक सेवा आयोग और प्रांतीय लोक सेवा आयोगों की स्थापना का प्रावधान किया गया।

➡️ यही आगे चलकर UPSC और State PSC बने।


11. बर्मा को भारत से अलग किया गया

  • 1937 में बर्मा (म्यांमार) को भारत से अलग कर दिया गया।

12. गवर्नर के विशेष अधिकार

  • गवर्नर को विशेष शक्तियाँ दी गईं:
    • अध्यादेश जारी करना
    • प्रशासनिक हस्तक्षेप
    • मंत्रिपरिषद को हटाना

➡️ वास्तविक शक्ति अभी भी अंग्रेजों के पास थी।

1935 अधिनियम का महत्व

1. भारतीय संविधान का आधार

  • भारतीय संविधान के कई प्रावधान इसी अधिनियम से लिए गए।

2. प्रांतीय स्वायत्तता

  • प्रांतों में जिम्मेदार सरकार बनी।

3. संघीय व्यवस्था की नींव

  • संघीय ढाँचे की शुरुआत हुई।

4. लोकतांत्रिक प्रक्रिया का विस्तार

  • चुनाव और प्रतिनिधित्व बढ़ा।

1935 अधिनियम की कमियाँ

1. पूर्ण स्वशासन नहीं

  • अंतिम शक्ति ब्रिटिश सरकार के पास रही।

2. गवर्नर के अत्यधिक अधिकार

  • चुनी हुई सरकारें कमजोर रहीं।

3. पृथक निर्वाचन

  • सांप्रदायिक विभाजन बढ़ा।

4. संघीय व्यवस्था लागू नहीं हुई

  • रियासतों के सहयोग के बिना योजना असफल रही।

1935 अधिनियम के प्रभाव

  • 1937 में प्रांतीय चुनाव हुए।
  • कई प्रांतों में कांग्रेस की सरकार बनी।
  • भारतीय नेताओं को प्रशासन का अनुभव मिला।
  • स्वतंत्रता आंदोलन और मजबूत हुआ।

परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

विषय तथ्य
अधिनियम का नाम Government of India Act, 1935
सबसे महत्वपूर्ण विशेषता प्रांतीय स्वायत्तता
संघीय न्यायालय 1937
RBI स्थापना 1935
तीन सूचियाँ संघ, प्रांत, समवर्ती
केंद्र में व्यवस्था द्वैध शासन
प्रांतों में व्यवस्था स्वायत्त शासन
लागू चुनाव 1937

एक लाइन में

“1935 का भारत शासन अधिनियम भारतीय संविधान की आधारशिला तथा प्रांतीय स्वायत्तता स्थापित करने वाला सबसे महत्वपूर्ण ब्रिटिश अधिनियम था।

1947 का भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम

(Indian Independence Act, 1947)

1947 का भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम ब्रिटिश संसद द्वारा 18 जुलाई 1947 को पारित किया गया।
इस अधिनियम के द्वारा भारत को ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता मिली और भारत तथा पाकिस्तान दो स्वतंत्र राष्ट्र बने।

  • यह अधिनियम ब्रिटिश प्रधानमंत्री Clement Attlee की सरकार द्वारा पारित किया गया।
  • यह अधिनियम 15 अगस्त 1947 से लागू हुआ।
Indian Independence Act, 1947

पृष्ठभूमि (Background)

1. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्थिति

  • ब्रिटेन आर्थिक और राजनीतिक रूप से कमजोर हो गया था।
  • भारत में स्वतंत्रता आंदोलन बहुत तेज हो चुका था।

2. भारत छोड़ो आंदोलन (1942)

  • Mahatma Gandhi के नेतृत्व में आंदोलन हुआ।
  • अंग्रेजों पर भारत छोड़ने का दबाव बढ़ा।

3. नौसेना विद्रोह (1946)

  • 1946 में भारतीय नौसेना में विद्रोह हुआ।
  • इससे अंग्रेजों को एहसास हुआ कि भारत पर शासन जारी रखना कठिन है।

4. कैबिनेट मिशन योजना (1946)

  • ब्रिटिश सरकार ने भारत के लिए समाधान खोजने का प्रयास किया।
  • लेकिन कांग्रेस और मुस्लिम लीग में सहमति नहीं बन सकी।

5. माउंटबेटन योजना (3 जून 1947)

  • वायसराय Louis Mountbatten ने भारत विभाजन की योजना प्रस्तुत की।
  • इसी योजना के आधार पर 1947 का अधिनियम बनाया गया।

1947 के भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम की मुख्य विशेषताएँ


1. भारत और पाकिस्तान का गठन

  • ब्रिटिश भारत को दो स्वतंत्र राष्ट्रों में बाँटा गया:
    1. भारत
    2. पाकिस्तान

➡️ पाकिस्तान 14 अगस्त 1947 को और भारत 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र हुआ।


2. ब्रिटिश शासन का अंत

  • भारत पर ब्रिटिश संसद का नियंत्रण समाप्त हो गया।
  • भारत और पाकिस्तान पूर्ण स्वतंत्र राष्ट्र बने।

3. गवर्नर जनरल का पद

  • प्रत्येक देश में एक गवर्नर जनरल नियुक्त किया गया।

भारत के पहले गवर्नर जनरल:

  • Louis Mountbatten

पाकिस्तान के पहले गवर्नर जनरल:

  • Muhammad Ali Jinnah

संविधान सभा की शक्ति

  • भारत और पाकिस्तान की संविधान सभाओं को अपने संविधान बनाने का अधिकार मिला।
  • जब तक नया संविधान नहीं बनता, तब तक 1935 का अधिनियम लागू रहा।

5. ब्रिटिश सम्राट की सत्ता समाप्त

  • ब्रिटिश सम्राट का “भारत के सम्राट” (Emperor of India) का पद समाप्त हो गया।

6. देशी रियासतों की स्वतंत्रता

  • देशी रियासतों पर ब्रिटिश नियंत्रण समाप्त हो गया।
  • उन्हें भारत या पाकिस्तान में शामिल होने या स्वतंत्र रहने का विकल्प मिला।

➡️ बाद में Sardar Vallabhbhai Patel ने अधिकांश रियासतों का भारत में विलय कराया।


7. भारत सचिव का पद समाप्त

  • भारत सचिव (Secretary of State for India) का पद समाप्त कर दिया गया।

8. विधायी अधिकार

  • भारत और पाकिस्तान की विधानसभाओं को पूर्ण कानून बनाने की शक्ति मिली।

अधिनियम का महत्व

1. भारत को स्वतंत्रता

  • लगभग 200 वर्षों के ब्रिटिश शासन का अंत हुआ।

2. लोकतांत्रिक शासन की शुरुआत

  • भारतीयों को अपना शासन चलाने का अधिकार मिला।

3. संविधान निर्माण का मार्ग

  • संविधान सभा ने भारतीय संविधान बनाना शुरू किया।

4. रियासतों का एकीकरण

  • भारत का राजनीतिक एकीकरण संभव हुआ।

अधिनियम की कमियाँ

1. भारत विभाजन

  • भारत और पाकिस्तान का विभाजन हुआ।
  • बड़े पैमाने पर हिंसा और दंगे हुए।

2. सांप्रदायिक तनाव

  • हिंदू-मुस्लिम संघर्ष बढ़ गया।

3. शरणार्थी समस्या

  • लाखों लोगों को पलायन करना पड़ा।

1947 अधिनियम के परिणाम

  • भारत स्वतंत्र राष्ट्र बना।
  • पाकिस्तान का निर्माण हुआ।
  • संविधान सभा ने संविधान निर्माण शुरू किया।
  • 26 जनवरी 1950 को भारत गणराज्य बना।

परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

विषय तथ्य
अधिनियम का नाम Indian Independence Act, 1947
पारित तिथि 18 जुलाई 1947
लागू तिथि 15 अगस्त 1947
अंतिम वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन
मुख्य आधार माउंटबेटन योजना
परिणाम भारत और पाकिस्तान का गठन
सबसे बड़ा प्रभाव ब्रिटिश शासन का अंत

 

“1947 का भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त कर भारत और पाकिस्तान को स्वतंत्र राष्ट्र बनाने वाला ऐतिहासिक अधिनियम था।

 

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